तेरहवीं क्यों मनाई जाती है

तेरहवीं सिर्फ भारत मे क्यों मनाई जाती है?

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1. तेरहवीं मनाने का आध्यात्मिक कारण

तेरहवीँ मनुष्य जीवन के अन्तिम (सोलहवेँ) सँस्कार का एक अन्ग है। इसके बिना इस सन्सकार की पूर्णता नहीं होती है।और्धदेहिक कृया के अन्तर्गत इसका अहम स्थान है।गरूड़ पुराण के अनुसार जिन मनुष्यों की यहक्रिया नहीं होती है उसकी प्रेतत्व मुक्ति नही होती है। तेरहवीँ क्रिया मृत्यु से तेरहवेँ दिन सम्पन्न की जाती है इस पिण्ड दान और तेरह ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है।

व्यक्ति के देहांत के बाद अचानक से उससे सम्बन्ध रखने वाले लोगो के मस्तिष्क पर गहर अवसाद घात पड़ता है, क्योंकि भारतीय लोग आपस में गहरे लगाव और प्रेम, मोह के रूप में एक दूसरे से घनिष्ठ रूप में जुड़े होते हैं यदि व्यक्ति ऐसे ही अवसाद में पड़ा रहा तो वो नकारात्मक विचार से घिर जायेगा और फिर कई गलत कदम उठाने की सोचेगा जैसे : वह स्वयं को नुकसान पंहुचा सकता है , खुद का प्राण ले सकता है , खुद के प्राण त्यागने के लिए कई उपाय सोचने और करने लग जायेगा || इसलिए उसे सामाजिक रूप से बांध दिया गया है जिससे वह अपने सामाजिक कर्तव्यों में व्यस्त रहे ओर 13 दिन तक कुछ भी उसे सोचने का मौका न मिले

इसलिए हिन्दू रीती रिवाजों के नाम पर व्यक्ति को उचित रूप में संभलने का मौका दिया गया है, रीती रिवाज के अनुसार उसे , मुखाग्नि, पूजा, आत्मा शांति पाठ, दसवीं, तेरहवीं अदि कार्य करने होते हैं, जिस वजह से वह व्यक्ति नकारात्मक सोच विचार करने का समय नहीं निकल पाता और फिर 13 दिन बाद मस्तिष्क शुद्ध रूप में काम करने लगता है

tervi in english – thirteenth mourned

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2. तेरहवीं मनाने का विज्ञानिक कारण

13 दिन की तेरहवीं के पीछे धार्मिक मान्यताएं जो भी चली आ रही हों, एक शोध मे इसका वैज्ञानिक कारण भी सामने आया है। 13 दिन से अधिक समय तक अगर कोई व्यक्ति उदास रहता है, तो उसे अवसाद घेर लेता है। इस सोध मे ये माना गया है की कोई भी व्यक्ति 13 दिन तक किसी भी घटना के लिए उदास रहता है व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए 13 दिन के भीतर शोक से मुक्त होना जरूरी है। यह निष्कर्ष मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में हुए अध्ययन से निकला है। इसी कारण से हिन्दू धर्म मे ये परंपरा को खास माना जाता है इसके बाद उस व्यक्ति को अपने दैनिक के कार्य आरंभ करने होते हैं

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संस्थान ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के इंटरनेशनल क्लासीफिकेशन ऑफ डिजीज तथा अमेरिकन साइकियाट्री सोसायटी द्वारा इस पर विस्तार से अध्ययन किया गया। विभिन्न मानसिक रोगों की अवधि को लेकर किए गए इस अध्ययन में से अवसाद की अवधि को अलग कर निष्कर्ष निकालने की कोशिश की गई। अध्ययन के दौरान पता लगा कि मनुष्य के उदास रहने की अधिकतम सीमा 13 दिन होती है। इसके बाद भी अगर उदासी कम नहीं होती तो वह मानसिक तौर पर बीमार पड़ सकता। उसे उदासी और अवसाद घेर लेते हैं। यही वजह है कि मृत्यु के बाद तेरहवीं के लिए 13 दिन सुनिश्चित किए गए हैं। 13 दिन बाद दिनचर्या सामान्य हो जाती है।

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3. दिमाग को सामंजस्य स्थापित करने में लगता है समय

अध्ययन करने वाले मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के अधीक्षक डॉ. निदेश राठौर के अनुसार दिमाग का हाइपोथैलेमस हिस्सा भावनाओं के लिए और सेरेब्रल कॉर्टेक्स व्यवहार के लिए जिम्मेदार होता है। उदास होने पर इन दोनों ही हिस्सों के न्यूरोट्रांसमीटर्स में गड़बड़ी आ जाती है। इससे दिमाग में सिरोटिनिन केमिकल का असंतुलन हो जाता है। यह केमिकल ही व्यक्ति को खुश रखने के लिए जिम्मेदार होता है। यह असंतुलन ज्यादा दिनों तक नहीं रहता। दिमाग के अन्य हिस्सों के साथ सामंजस्य स्थापित कर केमिकल संतुलित होने की कोशिश में लग जाता है।

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इस प्रक्रिया में आमतौर पर 13 दिन का समय लगता है। यही वजह है कि प्रियजन की मृत्यु पर पहले दिन परिजनों को भूख-प्यास नहीं लगती, दूसरे-तीसरे दिन भोजन ग्रहण करते हैं, लेकिन नींद फिर भी कम आती है। यह ब्रेन के फंक्शन के कारण होता है। सिरोटिनिन के संतुलन के साथ इच्छाओं और भावनाओं का आवेग सामान्य होता जाता है।

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शोक निमंत्रण पत्र कैसे लिखे ?

शोक पत्र – (01)

श्री / श्रीमती  ……………………………… (यहाँ पर उनका नाम लिखें जिन्हे आपको शोक निमंत्रण पत्र देना है )

                           (ॐ शान्ति II शोक संदेश II ॐ शान्ति)

1. अत्यंत दुख के साथ आपको सूचित करना पड़ रहा है कि श्री हनुमान दास बाबा जी के अनन्य भक्त, हमारे आदरणीय पूज्य पिता श्री ***** जी का स्वर्गवास दिनांक 10 .01 .2021  को हो गया है, ईश्वर इच्छा प्रबल है । ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में जगह दे । दिवंगत आत्मा की शान्ति के लिए दिनांक 23 .01 .2021 दिन मंगलवार को भंडारे का आयोजन श्री रामेश्वर दास बाबा जी के आश्रम प्रांगण में सुनिश्चित हुआ है । अत: आपकी उपस्थिति दिवंगत आत्मा को शान्ति प्रदान दें । भण्डारा प्रसाद अपराह्न 12 बजे से आपके आगमन तक रहेगा ।

2. अत्यंत दुःख के साथ सूचित किया जाता है कि हमारे पूज्य पिताजी श्री …… का स्वर्गवास दिनाँक…… को हो गया है. उनकी तेरहवीं दिनाँक ……। दिन …।।।। की होनी निश्चित हुईं है.

स्थल– पता, फोन नं इत्यादि

हवन ———————————————–सुबह 8-00 बजे

ब्रह्मभोज —————————————- दोपरह 12-00 बजे

रस्म पगड़ी —————————————–सांय 3-00 बजे

शोकाकुल

नाम एवं समस्त खानदान परिवार

शोक निमंत्रण पत्र फॉर्मेट कैसे बनाये

शोक निमंत्रण पत्र कैसे लिखे
शोक निमंत्रण पत्र कैसे लिखे ?

सो गया दरखत अपनी भुजाओं में ,
खेलकर बड़ा हुआ इन्हीं हवाओं में ,
तौल न सके तराजू से वाट उसे ,
उड़ गया कैसे कब इन्हीं हवाओं में.

कितने लम्बे हाथ थे जनाव उसके ,
कैसे द्रुतगामी घोड़े थे मन के उसके,
तोड़ दीं जंजीर, दीवार पत्थर की,
छोड़ मोह माया उड़ा हवाओं में.

फूलती टहनी खुशबू संवार दीं,
कलियाँ रंग भर भर उभार दीं,
छाया बनेंगी किसी थकी राह में,
रहेंगे हमसफ़र तुम स्वकलाओं में.

ब्रह्मभोज निमंत्रण कार्ड Nimantrann Card

त्रयोदशी संस्कार निमंत्रण पत्र Trayodashi Sanskar Nimantrann Patra
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1 thought on “तेरहवीं सिर्फ भारत मे क्यों मनाई जाती है?

  1. You can definitely see your skills in the work you write. The world hopes for even more passionate writers like you who aren’t afraid to say how they believe. Always follow your heart.

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